थाम लेते दामन तो कुछ अच्छा लगता
जाते ना यूँ छोड़के तो कुछ अच्छा लगता
यक़ीनन कमी रही होगी कुछ मुझमें ही
सीखा देते पूरा होना तो कुछ अच्छा लगता
नहीं याद करेंगे कभी ना ही पुकारेंगे
बुला लेते हमें ही पास तो कुछ अच्छा लगता
बेशक़ ज़िन्दगी तुम्हारी है उछाल दो चाहो जैसे
समेटना भी सिख जाते तो कुछ अच्छा लगता
अच्छा लगता है खुला आसमाँ हर किसी को
बैठ जाते वादियों में तो कुछ अच्छा लगता
दोराहें पर खड़ी है ज़िन्दगी अपनी अपनी
मक़ाम गर एक होता तो कुछ अच्छा लगता
ना माँगा कभी आपसे कुछ ना कुछ माँगेंगे
समझ लेते खुद ब खुद तो कुछ अच्छा लगता
याद आती है जब किसी की रो लेता हूँ में ही
गर पोछ देता आँसू कोई तो कुछ अच्छा लगता
खैर अब कैसा शिकवा और कैसा गिला किसीसे
लिखता कोई यह पंक्ति तो कुछ अच्छा लगता
रेत सी फिसल रही हैं बुँदे हाथ से कुछ यूँ
समेटते सागर आँखोंमें तो कुछ अच्छा लगता
@ *सागरराजे निंबाळकर*
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आपल्या अभिप्रायाबद्दल मनःपूर्वक आभार !