Saturday, April 20, 2024

अल्फाज मेरे

अल्फाज पढ़ लेती है वो मेरे
मगर, जज़्बात नहीं समझ पाती

फिर भी एक साथ है हम
जैसे होते हैं दिया और बाती

@ सागरराजे निंबालकर

गले लग जाता हूं

खामियां यकीनन होंगी मुझमें
मगर, रिश्ता अच्छे से निभाता हूं

कभी उसे कहता हूं लग जा गले
कभी खुद गले लग जाता हूं

@ सागरराजे निंबालकर


इसी अदा पे

बहस कितनी भी हो दोनो में
आखिर वो दिल से लगाती है 

इसी अदा पे तो फिदा हूं 
जो दिल को सुकून दिलाती है

@ सागरराजे निंबालकर